हर शाम की तरह वो भी इक रंगीन शाम थी,
हर चेहरे पर मुस्कान फ़ैली थी,
खिलखिलाते, मासूमियतसे भरे जिन्दगीका लुत्फ़ उठा रहे थे,
हर कोई एकदूसरेको हँसा रहा था,
उस रेस्तोरां का माहौल हर रोजक़े शाम जैसा ही था.....
लेकिन,आज की शाम, हर शाम जैसी नहीं थी उन दोनों के लिए,
कुछ ख़ास था वो लम्हा जिसका गवाह था ये रेस्तोरां,
हमेशा की तरह वो दोनो बैठे थे आंखोंमें आंखें डालकर,
हाथोंमें हाथ थामकर सजा रहे थे सपना नयी दुनिया का,
जिसे पूरा करनेके के लिए रोका था ख़ुदको कुछ अरसोंसे,
अब उनका रिश्ता तबदील होने जा रहा था इक पवित्र बंधन में....
रेस्तोरांका मालिक गवाह था उनकें और ऐसे कई जोडोंका,
जिन्होंने जिन्दगीके दुसरे पड़ाव की नीव वही थी डाली,
मुस्कुराते हुए उसने दोनोंको देखा....और तभी.....
धाय धाय की आवाजसे पूरा माहोल बदल गया,
गोलियोंके बौछार से तहेलका मच गया,
हर कोई ख़ुद को और अपनोको बचाने भागने लगा,
कुछ भी सूझ नहीं रहा था,
मुस्कुराता माहौल एकदम मौत के सन्नाटे में बदल गया...
क्योंकि इन्सान, इन्सान का ही दुश्मन बन बैठा था,
हर तरफ़ लाल रंग की कालीन बिछी हुई थी,
और उसपर लगे थे इन्सानोंके अम्बार,
कोई अपनोको ढूंड रहा था, तो कोई इन्सानियत को ...
उन दोनों में से वो बची थी,
हाथोंको थमाये हुए उसके बेजान खुली आँखोंमें बस देखें जा रही था,
कुछ लम्हों पहेलेकी रंगीनिया अन्धकार में बदल चुकी थी....
रेस्तोरांके दीवार से गोलियोंके निशान तो मिट गए थे,
पर दिलोंमें आज भी ताज़ा है....
….इक अरसा बीत गया पर न भूली सकी वो उस हादसेको,
खून तो क़ब का बहना बंद हो चूका था,
लेकीन सूखे हुए जख्म अभी भी बह रहे है....नम आँखोंसे....
- सुरेश सायकर
हर चेहरे पर मुस्कान फ़ैली थी,
खिलखिलाते, मासूमियतसे भरे जिन्दगीका लुत्फ़ उठा रहे थे,
हर कोई एकदूसरेको हँसा रहा था,
उस रेस्तोरां का माहौल हर रोजक़े शाम जैसा ही था.....
लेकिन,आज की शाम, हर शाम जैसी नहीं थी उन दोनों के लिए,
कुछ ख़ास था वो लम्हा जिसका गवाह था ये रेस्तोरां,
हमेशा की तरह वो दोनो बैठे थे आंखोंमें आंखें डालकर,
हाथोंमें हाथ थामकर सजा रहे थे सपना नयी दुनिया का,
जिसे पूरा करनेके के लिए रोका था ख़ुदको कुछ अरसोंसे,
अब उनका रिश्ता तबदील होने जा रहा था इक पवित्र बंधन में....
रेस्तोरांका मालिक गवाह था उनकें और ऐसे कई जोडोंका,
जिन्होंने जिन्दगीके दुसरे पड़ाव की नीव वही थी डाली,
मुस्कुराते हुए उसने दोनोंको देखा....और तभी.....
धाय धाय की आवाजसे पूरा माहोल बदल गया,
गोलियोंके बौछार से तहेलका मच गया,
हर कोई ख़ुद को और अपनोको बचाने भागने लगा,
कुछ भी सूझ नहीं रहा था,
मुस्कुराता माहौल एकदम मौत के सन्नाटे में बदल गया...
क्योंकि इन्सान, इन्सान का ही दुश्मन बन बैठा था,
हर तरफ़ लाल रंग की कालीन बिछी हुई थी,
और उसपर लगे थे इन्सानोंके अम्बार,
कोई अपनोको ढूंड रहा था, तो कोई इन्सानियत को ...
उन दोनों में से वो बची थी,
हाथोंको थमाये हुए उसके बेजान खुली आँखोंमें बस देखें जा रही था,
कुछ लम्हों पहेलेकी रंगीनिया अन्धकार में बदल चुकी थी....
रेस्तोरांके दीवार से गोलियोंके निशान तो मिट गए थे,
पर दिलोंमें आज भी ताज़ा है....
….इक अरसा बीत गया पर न भूली सकी वो उस हादसेको,
खून तो क़ब का बहना बंद हो चूका था,
लेकीन सूखे हुए जख्म अभी भी बह रहे है....नम आँखोंसे....
- सुरेश सायकर
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