Saturday, 8 November 2014

डूब रही है नैय्या, कूदो कूदो सोनी मैय्या...


विशाल समुंदर में कोंग्रसय्टानिक नामक जहाज दिशा भटकानेवाले तेज हवासे बचता हुआ अपने लक्श की ओर धीमे तेजीसे बढ़ रहा था. उसपर सवार अनेक यात्रियोंकी जान हलक तक आई थी. अब तक ये जहाज कितनेही ऐसे छोटे मोटे तुफ़ानोसे लड़ चूका था. पर इस बार की हवा कुछ और ही रंग दिखा रही थी. इस हवा का जोर नाकि सिर्फ़ जहाज की तेजी को रोकना था बल्की उसे समुंदर की तह तक डुबाने की फ़िराक में था. 

और इस विशाल जहाज का सारथ्य हमेशा की तरह कर रही थी एक जाबांज, कुशल, कॅप्टन सोनी मैय्या. जिन्हें ऐसी विपरीत परिस्तिथियोंसे लड्नेका ना ही सिर्फ़ ग्यान था बल्की हौसला बुलंद करके लढने के लिए उद्युक्त करवाने का जज्बा भी ठूंस ठूंस के भरा था. एकही वक़्त अनेक काम करने में वो बड़ी माहिर थी इस वक़्त वो जहाज चला रही थी और साथ ही में उन्होंने रानी झाँसी की तरह अपने नन्हे चालीस वर्ष आयु के राजकुंवर को अपने पीठसे बांध कर स्फुरण गीत गा रही थी (इटली का भाषांतर इस समय थोडा कठिन है...असो) और साथमे अपने साथियोंको साथ रहकर परिस्थितिकी सामना कर उसपर विजय पाने का हौसला बढ़ाने का कठिन कार्य भी कर रही थी. परन्तु, ख़ुद कॅप्टनके दिलमे इस वक़्त आशंकाओ ने डेरा जमा रखा था पर उन्होंने अपने चेहरे पर एक भी शिकंज न लाते हुए अपने सरदारोंको लढनेका आदेश दिया. नये भर्ती जोशीले सरदारोने फुर्ती दिखाई पर अनुभवी, थके हुए और लड़ाई का नतीजा लड़नेसे पहले ही जान चुकें सरदारोने अपनी तलवारे म्यान की हुई थी. उनके चेहरे पर ना ही वो पहेलेवाला जोश था ना ही लड्नेकी ताकत बची थी ना ही इच्छाशक्ति. वो किसी भी तरह अपने आपको डुबनेसे बचाने के योजना में व्यस्त थे. आज तक ऊँची रहेन-सहेन वाली, ऐशोआराम की जिंदगी प्रदान करनेवाले जहाज के डूबने की कुछ भी फ़िकर या चिंता उन्हें नहीं थी ना ही उसे बचाने के लिए इच्छाशक्ति उनके पास थी. बस्स अपनी लंगोटी बच जाये यही उनके लिए काफ़ी था. हर एक के मन में शंका थी पर कॅप्टन के सामने मुह खोलने की ताकत किसी में भी नहीं थी. ऐसे में एक सरदारने डेक पर जाकर परिस्थिति का जायजा लेने का नाटक किया और डेक पर पहुचते ही जीवरक्षक जेकेट चढ़ाकर ख़ुद को समुंदर में झोंक दिया. कॅप्टनने आवाज सुनी लेकिन एक के जाने से क्या फर्क पड़ेगा ये सोचकर आवाज को अनसुना कर दिया. इससे बाकी भगोड़े सरदारोंका मनोबल बढ़ गया (लढने के लिए नहीं बल्की लुंगी बचाकर भागने के लिए) उन्होंने भी एक एक कर जहाजसे विदाई ली. 

उसी वक़्त समुंदर से अनेक छोटी छोटी नाव जहाज का जो लक्श था उसी की और बढ़ रही थी. लेकिन हवा के जोर ने उनका भी मनोबल तोड़ दिया था. उनका लड़ने का मनोबल हिमालय की चोटी उतना  ऊँचा था पर उसके लिए जान बचाना भी जरुरी था. कठिन परिस्थिति के रहते उन्होंने परेशानियोंसे बचनेके लिए ‘हाथ’ मिलाते हुए जहाज का सहारा लिया. इससे कॅप्टनका का जोश दुगना हुआ उन्होंने अपने पीठसे बंधे नन्हे राजकुंवर की तरफ़ देखा तो वो मासूमियत भरे चेहरे से मुस्कुराते हुये अपने गालोंके गड्ढे को और गढ़ा करते हुए अपने कॅप्टन ममा की ओर देख रहा था. लेकिन जैसे ही कॅप्टन की नजर बचे हुए सरदारों पर गयी तो उनके हाथ कापने लगे. जहाज छोड़नेवाले उनके निष्ठावान सरदार ‘अनेक’ थे और जो जहाज पर चढ़े थे वे बस ‘कुछ’ ही थे. और जो बचे थे उनमें एक तो कुछ बच्चे थे और बाकी बचे हुए ‘कॅप्टन’ बनने की फ़िराक में.
ये देखकर कॅप्टन सोनी मैय्या के आन्खोंके सामने अंधेरा छाने लगा. उनकी दशा ऐसी थी की,    
हमको तो अप्नोंने लूटा गैरो में कहा दम था... मेरा जहाज डूबा था वहा जहा पानी ही कम था
 मराठी रुपांतर: आलीया भोगासी भोगलेची पाहिजे, आपुले मरण पहिले म्या डोळा – इति. अवध्या स्वामी

-सुरेश सायकर

This was written on 29.03.2014 before Election. So it's kind of Prediction & which was Very Much correct. Same was shared on Facebook as well on the same day....enjoy :)
 

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